शायरियों का खज़ाना है मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली

महान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को समझना और अगर उन्हें करीब से जानना हो तो एक बार उनके हवेली ज़रूर जाए जो अब एक म्यूज़ियम बन चुकी है.

शायरियों का खज़ाना है मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली शायरियों का खज़ाना है मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली Source : Press

महान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को समझना और अगर उन्हें करीब से जानना हो तो एक बार उनके हवेली ज़रूर जाए जो अब एक म्यूज़ियम बन चुकी है.

 मिर्ज़ा गालिब उर्फ़ मिर्जा असदुल्ला बेग खां गालिब ने अपनी ज़िन्दगी के कुछ आखिरी पल बल्लीमारान की इसी हवेली में काटी थी. पुराणी दिल्ली के सकरी गलियों में बसी ग़ालिब की हवेली किसी पहचान की मोहताज नहीं है. 

जैसे ही आप घर में प्रवेश करते है उसी पल दीवारों पर ग़ालिब के अशआर नज़र आने लगते है यहाँ तक की उनकी अजीम शयी का भण्डार भी आपको देखने मिल सकती है. ग़ालिब साहब का जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था हालाकिं वो कुछ सालों बाद वो दिल्ली आकर बस आ गए.

 उन्होंने करीब ९ सालों तक इसे अपना निवास बनाया. इस हवेली में आने के बाद उन्होंने अपनी जादुई शब्दों से कई मोती पिरोएं जो आज भी हम सभी के जेहन में बसा हुआ है.

 उसी दौरान उन्होंने उर्दू और फारसी भासा में 'दीवान' की रचना की. 27 दिसंबर, 1797 को जन्में ग़ालिब का निधन 15 फरवरी, 1869 को हुआ. इसके बाद साल 1999 से इस हवेली में बाज़ार लगता था और भी कई सरकारी कामों के लिए इस हवाल का प्रयोग किया जाने लगा और आख़िरकार भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया.

 घर में कदम रखते ही नज़र आती है संगमरमरी बुत पर यदि उनकी किताबें. यहाँ तक की हवेली की दीवारों पर गालिब साहब और उनकी शायरियां उर्दू और हिंदी में नज़र आ जाती हैं.